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रश्क-ए-बर्क़-ए-तूर शम्-ए’-महफ़िल-ए-जानाना हैमाह-ए-नौ टूटा हुआ इस बज़्म का पैमाना है
ख़ुद बर्क़ हो और तूर-ए-तजल्ला से गुज़र जाख़ुद शो'ला बन और वादी-ए-सीना से गुज़र जा
बन कर मैं कभी मूसा सर-ए-तूर जा रहा हूँई'सा मैं कभी बन कर मर्दे जिला रहा हूँ
ख़्वाहिश-ए-दीद जो कर बैठे सर-ए-तूर कोईतूर ही बढ़ के तजल्ली से जला देते हो
मंतर दे कर तूर आँखों का बढ़ाना तुझेतूर पर सूरत-कश बर्क़-ए-बुताँ तू ही तो था
सुर्मगीं आँखें बर्क़-ए-तजल्लातूर हुआ कब हामिल-ए-जल्वा
देख लूँ आज वो जो मूसा नेमाजरा कोह-ए-तूर में देखा
रब्बी-अरेनी की क्या ज़रूरत हैदिल पर नूर-ए-तूर है मेरा
नूर हरगिज़ नार हो सकता नहींतूर फिर कैसे जला है नूर से
चलें गो कि सैकड़ों आँधियाँ जलें गरचे लाख घर ऐ फ़लकभड़क उठ्ठे 'आतिश'-ए-तूर फिर कोई इस तरह की दवा नहीं
मेरी निगाह-ए-इ'ज्ज़ तमाशा लिए हुएथा हर नज़र में तूर का जल्वा लिए हुए
तुझे इस रंग में क्या बर्क़-ए-तजल्ला देखेंतूर पर आग लगे लोग तमाशा देखें
मूसा हैं हमीं जल्वा-ए-दीदार हमीं हैंहैं तूर हमीं नूर हमीं नार हमीं हैं
ज़माना तूर का याद आगया ज़माने मेंजिधर भी तू ने उठा कर नक़ाब देख लिया
हर ज़र्रे को इक तूर बनाते हुए आतेये हो न सका जल्वे लुटाते हुए आते
यार ने जब से किया दिल में क़यामबढ़ के कोह-ए-तूर से ये तन हुआ
दीवाना-ए-परी हूँ न शैदा हूँ हूर कापरवाना हूँ मैं शम'-ए-तजल्ली-ए-तूर का
वो कोह-ए-तूर हो या सरज़मीन-ए-दिल 'बेदम'जमाल-ए-यार से ख़ाली कोई दयार नहीं
मूसा को बर्क़-ए-तूर का जल्वा दिखा दियापहुँचा तड़प के दौर मिरा बे-क़रार दिल
हम तिरे हुस्न के बाज़ार से फिर जाएँ कहाँतूर ठेका हो जो मूसा से तमाशाई का
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