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कलाम
पीर नसीरुद्दीन नसीर
कलाम
नहीं आश्ना मिरे हाल से कोई आँख बज़्म-ए-मजाज़ मेंहूँ वो आईन: जो है ना-तमाम अभी ज़ेहन-ए-आईनः-साज़ में
सीमाब अकबराबादी
कलाम
अंदर हू ते बाहर हौ हू बाहर कत्थे जलेंदा हूहू दा दाग़ मोहब्बत वाला हर-दम नाल सड़ेंदा हू
सुल्तान बाहू
कलाम
तिरे कहने से मैं अज़-बस-कि बाहर हो नहीं सकताइरादा सब्र का करता तो हूँ पर हो नहीं सकता
ख़्वाजा मीर दर्द
कलाम
हाल में अपने मस्त हूँ ग़ैर का होश ही नहींरहता हूँ मैं जहाँ में यूँ जैसे यहाँ कोई नहीं
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
कलाम
अजब ही हाल है मेरा सनम जाने कि हम जानेंखुला है राज़ बातिन का सनम जाने कि हम जानें
मख़दूम ख़ादिम सफ़ी
कलाम
अंदर भी हू बाहर भी हू'बाहू' कथाँ लुभीवे हूसे रियाज़ ताँ कर कराहाँख़ून जिगर दा पीवे हू
सुल्तान बाहू
कलाम
गंदुम को खा के 'रिज़वाँ' हैं ऐसे हाल में हमपहले 'उरूज पर थे अब हैं ज़वाल में हम
अज़ीज़ुद्दीन रिज़वाँ क़ादरी
कलाम
फ़ना का जाम ऐ साक़ी मैं पी-पी लूँ तू भर-भर देबक़ा की मय से आँखें मिस्ल-ए-नर्गिस-ए-मस्त कर-कर दे