Sufinama

क़व्वाली

क़व्वाली मौसीक़ी की एक किस्म है, जब किसी क़ौल (कथन) को बार-बार दुहराया जाये तो उसे क़व्वाली कहते हैं। क़व्वाली को सिलसिला-ए- चिश्तिया में ख़ास एहमीयत दी जाती है। इस में क़व्वाल किसी कलाम या ग़ज़ल को तरन्नुम के साथ पेश करते हैं जिसको सुनते ही हाज़रीन-ए-महफ़िल कैफ़-ओ-मस्ती का इज़हार करते हैं, रिवायात के मुताबिक़ क़व्वाली की शौहरत हज़रत अमीर ख़ुसरो से हुई। क़दीम रिवायती कलाम ज़्यादा-तर फ़ारसी और उर्दू में मिलता है, ताहम आजकल पंजाबी, सरायकी, पश्तो, सिंधी, बलूची और दीगर ज़बानों में भी क़व्वाली बड़ी प्रसिद्द है।

फ़ारसी कलाम

फ़ारसी सूफ़ी कलाम का विशाल लोकप्रिय संग्रह | सूफ़ीनामा

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भजन

सूफ़ी संतों ने भजन भी लिखे हैं जो सूफ़ी ख़ानक़ाहों पर ख़ूब गाये जाते हैं. क़ाज़ी अशरफ़ महमूद द्वारा रचित भजन दर्शनोल्लास को पंडित भीमसेन जोशी जी ने अपनी आवाज़ दी थी जो बड़ी प्रसिद्द हुई ।

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ना'त-ओ-मनक़बत

ना’त हज़रत मुहम्मद (PBUH) की शान में लिखे गए कलाम को कहते हैं। ना’त को हम्द के बा’द पढ़ा जाता है। मनक़बत किसी सूफ़ी बुज़ुर्ग की शान में लिखी गयी शायरी को कहते हैं। हम्द और ना’त के बा’द अक्सर क़व्वाल जिस सूफ़ी बुज़ुर्ग के उर्स पर क़व्वाली पढ़ते हैं उनकी शान में मनक़बत पढ़ी जाती है।

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चादर

उर्स के साथ इस रस्म को मनाया जाता है। चादर आदर और सम्मान की अलामत है। मुरीद चादर के चारों कोनों को पकड़ कर खड़े होते हैं और साथ साथ बाकी मुरीद चलते हैं। चारों कोनों से पकड़ कर चादर सर के ऊपर टांग ली जाती है और साथ साथ क़व्वाल चादर पढ़ते हैं। उर्स के अलावा बाकी दिनों में भी चादर-पोशी के दौरान चादर पढ़ी जाती है।

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क़व्वाली वीडियो

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सेहरा

सेहरा अक्सर फूलों का या सुनहरी तारों का होता है जो दुल्हे के सर पर बाँधा जाता है। उसकी लटकनें दुल्हे के चेहरे पर लटकती रहती हैं और उन से दुल्हे का चेहरा छुपा होता है। सूफ़ी ख़ानक़ाहों में जब किसी सज्जादानशीन की शादी होती है तब क़व्वाल सेहरा पढ़ते हैं।

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सलाम

यह एक विधा है जिसमे पीर,पैग़म्बर और बुजुर्गों पर सलाम भेजा जाता है। यह एक दुआ होती है। सलाम का अर्थ सलामती है।सलाम एक दुआ है कि सब सूफ़ी सुख और अमन बाटें।

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