Sufinama

साखी 6

कोयल अंडे काक गृह, सुत निपजे पर सेव

त्यों रज्जब शिष भाव को, प्रति पाले गुरू देव ।।

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'रज्जब' राम रहम कर अक्षर लिखे भाल

ताथें सद्गुरू ना मिलया गुरू शिष रहे कंगाल

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अथ जतन का अंग - जन 'रज्जब' राखे बिना नाम राख्या जाय

जैसे दीपक जतन बिन विसवाबीस बुझाय

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