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अज्ञात

अज्ञात

ग़ज़ल 53

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सूफ़ी लेख 7

कलाम 293

दोहा 102

नदी किनारे धुआँ उठत है मैं जानों कुछ होय

जा कारन जोगिन भई वही न जलता होय

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पीत किए धन धर्म गयो उर बिगड़े सिगरे काम

अपने थे सो बैर भय और नाम हुआ बदनाम

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मीर में मीर अमीर वही जो अमीर हुए पे ग़ुरूर करै ना

पीर में पीर फ़क़ीर वही जो फ़क़ीर हुवे पै सवाल करै ना

ता'रीफ़ उसी तरवार की है जो धार पै अपने झुरै ना मुरै ना

मर्द में मर्द वही है भलो जो कहै सो करै जो करै सो कहै ना

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मोहे न नार नार के रुपा

पन्नगार ये नीत अनूपा

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सबै सहायक सबल के कोउ न निबल सहाय

पवन जगावत आग को दीप ही देत बुझाय

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दकनी सूफ़ी काव्य 4

 

सूफ़ी साहित्य 2

 

वीडियो 517

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